शिव कौन है और उनका जन्म कहा हुआ?

इससे पहले कि आप शिव कौन है? ये जानने की कोशिश करें, मैं आपको पूरे लेख को पढ़ने का सुझाव देना चाहूंगा, भले ही आप कुछ हिस्सों में न समझें। इसे धीरे-धीरे पढ़ें और समझने की कोशिश करें।

महान विनाशकारी शिव, सबसे शक्तिशाली नाम। शिव का अर्थ है, जो अस्तित्व में नहीं है, लेकिन उसकी उपस्थिति के कारण, ब्रह्मांड मौजूद है। वह जो ब्रह्मांड और पदार्थ के निर्माण का कारण है, वह जो पूरे ब्रह्मांड में सबसे शक्तिशाली है, वह जो सभी 16 आयामों(dimensions,आकार) में मौजूद है, वह जिसका ना तो कोई शुरुआत है और न ही अंत, वो है शिव। यह जानना इतना कठिन नहीं है कि शिव कौन हैं, आपको बस प्रकृति और ब्रह्मांड को समझने की आवश्यकता है।

तो, शिव कौन है? आइए समझने की कोशिश करते हैं।

 शिव कौन है

शिव कोई ऐसी चीज नहीं है जो वहां आकाश में बैठे हों और हम सभी को देख रहे हों। शिव एक आयाम(dimension) है। शिव का अर्थ है शून्य(कुछ नहीं , nothing), जिससे ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई। जिससे सब कुछ बाहर आता है और उस के भीतर शमा जाता है, उस आयाम को शिव के रूप में जाना जाता है। शिव बिना किसी आकार के एक निराकार ऊर्जा है। भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु उस ऊर्जा के प्रवाह के साथ आए थे । शिव परम है। वह कोई देवता नहीं, बल्कि वह स्रोत है जहाँ से देवता आए थे। उसके पास न तो बचपन है, न ही मां। क्योंकि वह आदिदेव महादेव हैं।

Nothing का मतलब

Nothing का मतलब no-thing होता है,ये नहीं की उसका अस्तित्वा नहीं है। विज्ञान भी no-thing यानी अस्तित्व के गैर-भौतिक आयाम(dimension) के बारे में बात कर रहा है,जो निराकार है। कुछ ऐसा जो कोई वस्तु नहीं है लेकिन फिर भी एक शक्तिशाली ताकत है। हम परमाणु ऊर्जा, चुंबकीय ऊर्जा या ऊर्जा के किसी अन्य रूप के बारे में बात नहीं कर रहे हैं जिसे हम जानते हैं, हम उस nothingness ( जिसे हम समझ नहीं सकते ) के बारे में बात कर रहे हैं, जो बेहद शक्तिशाली है। आधुनिक विज्ञान इसे ब्लैक होल या ब्लैक फ़ोर्स कहता है।

हम एक ऐसे आयाम(आकार) के बारे में बात कर रहे हैं जो किसी चीज का स्रोत है, हमारे आस-पास की हर चीज कहीं न कहीं से आई है, जिसे हम nothing(जिसे हम समझ नहीं सकते) कहते हैं, क्योंकि इसका कोई भौतिक रूप नहीं है।

भौतिक रूप का मतलब एक निश्चित परिभाषित सीमा है, अगर कोई सीमा नहीं है तो कोई भौतिक रूप नहीं है। जब हम खुद को देखते हैं, तो हम देख सकते हैं कि हमारे पास एक परिभाषित सीमा है, हमारे घर का एक परिभाषित सीमा है। वो सबकुछ को हम देख सकते है उसका एक सिमा जरूर होगा।

जब हम आकाश में देखते हैं, हम लाखों सितारों को देख सकते हैं। लेकिन अगर हम इन सब को भी मिला कर देखे तो ये पूरे आकाश का 0.1% भी नहीं होंगे। कोई भी उस खाली स्थान पर ध्यान नहीं देता, वह nothing(जिसे हम समझ नहीं सकते) है। हम उस खाली जगह को नहीं देख सकते, क्योंकि हमारा दृश्य तंत्र इसके लिए नहीं बना है। हम केवल वही देख सकते हैं जो प्रकाश को रोकता है।

हमें जीवन जीने के लिए हवा की आवश्यकता है, लेकिन हम इसे देख नहीं सकते हैं, तो क्या हम इसके बिना रह सकते हैं, नहीं हम नहीं रह सकते। इसलिए, जिसे आप देख नहीं सकते हैं, जिसे आप स्पर्श नहीं कर सकते हैं, जिसे आप 5 ज्ञानेंद्री के माध्यम से ना ही देख या महसूस कर सकते हैं, उसे “no -thing” या “nothing” कहा जाता है जिसे हम शिव के नाम से जानते है।

भौतिक सामान के रूप में यहां मौजूद सभी का स्रोत अनिवार्य रूप से उसी से आता है जो “no-thing” या “शिव” है। लोग तीसरी आंख के बारे में बात करते हैं, उन्हें लगता है कि माथा फूटेगा और तीसरी आंख बाहर निकलेगी। ऐसा कुछ नहीं है, हमारे पास दो आंखें हैं जिनका उपयोग हम उसे देखने के लिए करते हैं,जिसका कोई आकार होता है। जिस दिन आपने एक ऐसी चीज़ को देखना शुरू किया, जिसकी कोई आकृति नहीं है, तो आप कह सकते हैं कि आपकी एक और आंख है और आप इंद्रियों की सीमा से परे देख सकते हैं। शंकराचार्य ने इस मुकाम को हासिल किया था और उन्होंने महसूस किया है कि वह भगवान शिव से अलग नहीं हैं। इसलिए हम यह बोल सकते है की, शिव एक अवस्था है, जिसे प्राप्त किया जा सकता है ,पर वो इतना आसान नहीं है इसके लिए आपको अपने इन्द्रियों पर काबू करना होगा।।

एक बार शंकराचार्य मोक्ष की तलाश में हिमालय में भटक रहे थे, वहाँ उनकी मुलाकात एक तपस्वी से हुई जिसने उनसे पूछा कि “आप कौन हैं और आप यहाँ क्यों आए?”।

जिसके लिए उन्होंने एक काव्यात्मक तरीके से जवाब दिया, जिसे “आत्मसातम्कम्” भी कहा जाता है:

मनो बुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहम्
न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे
न च व्योम भूमिर् न तेजो न वायु:
चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥१॥

न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायु: 
न वा सप्तधातुर् न वा पञ्चकोश:
न वाक्पाणिपादौ न चोपस्थपायू 
चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥२॥

न मे द्वेष रागौ न मे लोभ मोहौ 
मदो नैव मे नैव मात्सर्य भाव:
न धर्मो न चार्थो न कामो ना मोक्ष: 
चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥३॥ 

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं
न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञाः ।
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥४॥

न मृत्युर् न शंका न मे जातिभेद: 
पिता नैव मे नैव माता न जन्म
न बन्धुर् न मित्रं गुरुर्नैव शिष्य: 
चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥५॥


अहं निर्विकल्पॊ निराकार रूपॊ 
विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्
न चासंगतं नैव मुक्तिर् न मेय: 
चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् ॥६॥ 

अर्थ

मैं मन नहीं हूँ, न बुद्धि ही, न अहंकार हूँ, न अन्तःप्रेरित वृत्ति;
मैं श्रवण, जिह्वा, नयन या नासिका सम पंच इन्द्रिय कुछ नहीं हूँ
पंच तत्वों सम नहीं हूँ (न हूँ आकाश, न पृथ्वी, न अग्नि-वायु हूँ)
वस्तुतः मैं चिर आनन्द हूँ, चिन्मय रूप शिव हूँ, शिव हूँ।

मैं नहीं हूँ प्राण संज्ञा मुख्यतः न हूँ मैं पंच-प्राण1 स्वरूप ही,
सप्त धातु2 और पंचकोश3 भी नहीं हूँ, और न माध्यम हूँ
निष्कासन, प्रजनन, सुगति, संग्रहण और वचन का4;
वस्तुतः मैं चिर आनन्द हूँ, चिन्मय रूप शिव हूँ, शिव हूँ।  
1. प्राण, उदान, अपान, व्यान, समान;  2. त्वचा, मांस, मेद, रक्त, पेशी, अस्थि, मज्जा; 
3. अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय, आनन्दमय; 4. गुदा, जननेन्द्रिय, पैर, हाथ, वाणी

न मुझमें द्वेष है, न राग है, न लोभ है, न मोह,
न मुझमें अहंकार है, न ईर्ष्या की भावना 
न मुझमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ही हैं, 
वस्तुतः मैं चिर आनन्द हूँ, चिन्मय रूप शिव हूँ, शिव हूँ।  

न मुझमें पुण्य है न पाप है, न मैं सुख-दुख की भावना से युक्त ही हूँ
मन्त्र और तीर्थ भी नहीं, वेद और यज्ञ भी नहीं
मैं त्रिसंयुज (भोजन, भोज्य, भोक्ता) भी नहीं हूँ
वस्तुतः मैं चिर आनन्द हूँ, चिन्मय रूप शिव हूँ, शिव हूँ।

न मुझे मृत्य-भय है (मृत्यु भी कैसी?), न स्व-प्रति संदेह, न भेद जाति का
न मेरा कोई पिता है, न माता और न लिया ही है मैंने कोई जन्म
कोई बन्धु भी नहीं, न मित्र कोई और न कोई गुरु या शिष्य ही
वस्तुतः मैं चिर आनन्द हूँ, चिन्मय रूप शिव हूँ, शिव हूँ।

मैं हूँ संदेह रहित निर्विकल्प, आकार रहित हूँ 
सर्वव्याप्त, सर्वभूत, समस्त इन्द्रिय-व्याप्त स्थित हूँ   
न मुझमें मुक्ति है न बंधन; सब कहीं, सब कुछ, सभी क्षण साम्य स्थित
वस्तुतः मैं चिर आनन्द हूँ, चिन्मय रूप शिव हूँ, शिव हूँ।
आचार्य शंकर रचित निर्वाण षटकम्‌ ||

क्या शिव का जन्म हुआ था?

यह कहना बहुत मुश्किल है कि शिव का जन्म हुआ था या वह कहीं और से आए थे। यह एक बहुत ही बहस का विषय है, विभिन्न विद्वानों का मत अलग है।

जब आप शिव के बारे में बात करते हैं तो उनके कोई माता-पिता नहीं है, कोई जन्म स्थान नहीं है, किसी ने उन्हें एक युवा लड़के के रूप में नहीं देखा और हमें ये भी नहीं पता कि उनकी मृत्यु कहा हुई। इतना महत्वपूर्ण व्यक्ति उस समय में भी अगर वह कहीं उनकी मृत्यु हुई होती तो कोई मंदिर बनाना चाहिए था,पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। इसलिए, न उनके जन्म,न मृत्यु ,न माता-पिता और न ही कोई भाई-बहन के बारे मे किसी को कुछ पता है, यह साबित करने के लिए कुछ भी नहीं है कि वह यहां थे।

तो, क्या इसका मतलब वह कहीं से आए थे, जरूरी नहीं है?

शिव को यक्षस्वरूप के रूप में संदर्भित करना बहुत आम है, यक्ष का मतलब उन प्रकार के प्राणियों से है जो मानव नहीं हैं, लेकिन जो इस ग्रह पर प्राकृतिक वातावरण में मौजूद हैं। वह कहां से आए इसका कोई सटीक प्रमाण नहीं है। लेकिन कई पुरानी किताबों और गीतों में उन्हें यक्ष रोपा के रूप में माना जाता है।

योगिक नियम में, यह अनुमान लगाया गया है कि 60000 से 75000 वर्ष पूर्व शिव इस ग्रह पर कहीं मौजूद थे। लेकिन, लोग इस पर विश्वास नहीं करेंगे, एक बात जो मैं बताना चाहूंगा वह यह है कि आधुनिक खगोल विज्ञान के अनुसार खगोलीय व्यवस्था केवल 60000-80000 साल पहले से मौजूद है। और हम जानते रहे हैं कि शिव ने इस ब्रह्मांड को बनाया है।

30000 वर्ष पुराने शहर के अवशेष
30000 वर्ष पुराने शहर के अवशेष
खंभात की खाड़ी

और अब खंभात की खाड़ी (Gulf of Khambhat) में, उन्होंने अन्वेषण किया है और उन्हें एक शहर मिला है जो 5 वर्ग मील है। कार्बन डेटिंग (वैज्ञानिकों द्वारा जैविक नमूनों की उम्र जानने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली तकनीक) के बाद यह पाया गया कि यह न्यूनतम 30000 वर्ष पुराना था।

यहां तक कि, हम कृष्ण के द्वारका शहर के बारे में जानते हैं, यह अस्तित्व में था और हमारे पास वैज्ञानिक प्रमाण हैं। इसलिए, यह कहने के लिए पर्याप्त प्रमाण है कि लगभग 30000 साल पहले इस ग्रह पर एक सभ्य समाज था। पूरी दुनिया कहती थी कि मानव अस्तित्व केवल 3000 साल पहले हुआ है। लेकिन इन शहरों की खोज के बाद, उन्होंने अपना मन बदल दिया है और अब वे मानते हैं कि हाँ एक सभ्यता 3000 साल पहले मौजूद थी। और आप देखेंगे कि 20-30 वर्षों के बाद आधुनिक विज्ञान आएगा और कई बातें कहेगा जो हम 1000 वर्षों से बात कर रहे हैं।

इसलिए, अंत में, मैं यह कहना चाहूंगा कि शिव को समझने के लिए आधुनिक विज्ञान को अभी और उन्नत होने की आवश्यकता है। लेकिन एक दिन हम ब्रह्मांड को जरूर समझ लेंगे और उस दिन हमारे सवाल,शिव कौन है? का जवाब मिल जायगा।

ऐसे और आर्टिकल पढ़ने के लिए क्लिक करें

This Post Has One Comment

Leave a Reply